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Changing Tax Structure in India and its Challenges Part - 2
Date –Dec 08, 2019
Duration – 8 hrs
Fee –  5500
National Seminar on women empowerment
Date –Dec 15, 2019
Duration – 8 hrs
Fee –  4500
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  • Basic Level computer courses for Economical poor House wife (2nd Batch)

  • Child Computer literacy

  • Advance workshop on research methods, spss & research paper writing

  • Comprehensive Career & Counseling Programme



भारत के शासकों का अन्तर्राष्ट्रीय संबंध

Registration Fee –  7000  per candidate
Duration – 8 hrs
Date – Feb 17, 2019
Venue -JANAK PALACE , C4 , JANAK PURI , NEW DELHI

मुगल शासकों के अन्तर्राष्ट्रीय नीतियों तथा संबंधों के स्वरूप और सिद्धान्त, शासकों की व्यक्तिगत योग्यता, स्वभाव, अभिरूचि तथा नीतियों के साथ-साथ उस काल की परिस्थितियों पर निर्भर था। प्रारम्भ में मुगल संरक्षकों का महत्व भी अस्वीकार नहीं किया जा सकता है जिनकी सहमति के बिना मुगल सम्राट अन्तर्राष्ट्रीय संबंध स्थापित नहीं कर सकता था। सम्राट अकबर ने अपने संरक्षोकत्व से मुक्ति प्राप्त करने के उपरांत साम्राज्यवादी नीतियों के अनुसरण करने की एक वृहद योजना बनाई। परन्तु जिस समय अकबर अन्तर्राट्रीय संबंधों का महत्व समझने वाला था उस समय अकबर के संरक्षक बैरम खाँ ने पर्षिया के साथ राजनीतिक संबंध स्थापित करने का कार्य किया। पर्षिया के शासन के साथ संबंध स्थापित कर मुस्लिम जगत में सम्राट अकबर ने पूर्ण सफलता हासिल की। कंधार की समस्याओं को और उज्जबेग के विद्रोहात्मक आन्दोलन के लिए उचित कदम उठाते हुए सम्राट अकबर ने तटस्थता की नीति का समर्थन कर एक ऐसा कूटनीतिक संबंधों का स्वरूप आरम्भ किया जो सिद्धान्त रूप में मुगल राजसत्ता के अनुकूल तथा सम्राट के लिए हितकारी था।


   

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1556 ई0 से 1707 ई0 के कालखण्ड में मुगल सम्राटों ने अन्तर्राष्ट्रीय जगत के शक्तिषाली पड़ोसी विदेषी क्षेत्रों के साथ अपने मैत्रीपूर्ण संबंध की नीति का अनुसरण कर उत्तम संबंध बनाकर अपना सर्वांगीण विकास किया। अन्तर्राष्ट्रीय जगत में खासकर सम्राट अकबर षिया-सुन्नी, अन्यान्य भेदभाव को भुलाकर, ईरानी-तुरानी प्रभाव से अलग होकर पर्षिया के शासक के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध कायम किया। अन्य मुगल सम्राट अपना संबंध अकबर के समान मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित करने में पीछे रहे। मुगल शासन की नींव बाबर ने 1526 ई0 में भारत में रखा उस शासन का प्रभाव बाद के मुगल बादषाहों के समय में न केवल भारत तक सीमित रहा बल्कि भारत से बाहर अन्तर्राष्ट्रीय जगत में मुगलों का प्रभुत्व कायम हो गया। 1556 ई0 से 1707 ई0 के बीच शासन करने वाले मुगल शासकों यानि महान अकबर से लेकर औरंगजेब के कालों में अन्तर्राष्ट्रीय संबंधों की व्याख्या करने के क्रम में कुछ मूल भूत तत्वों का विष्लेषण आवष्यक प्रतीत होता है।

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